हिमालय के पहाड़ों पर बर्फबारी की खबरें और पर्यटन स्थलों, खासकर शिमला, मनाली जैसी जगहों से की सफेद चादरों के नजारे दिखाने वाले फोटो सामने आने लगी है। पिछले तीन दिनों से पश्चिमी विक्षोभ के पहाड़ और उत्तरी भारत के मैदानों में पहुंचने की खबरें आ रही रही थीं, लेकिन आसमान मायूसी से अधिक कुछ और नहीं दिखा रहे थे।
22 जनवरी की देर रात और 23 जनवरी के आगमन के साथ तेज हवा और बादलों का प्रभाव बढ़ता गया और देखते-देखते लंबे समय इंतजार किया जा रहा बारिश और बर्फबारी का दृश्य दिखने लगा। जम्मू-कश्मीर से लेकर हिमाचल और उत्तराखंड के पहाड़ों पर बर्फबारी और निचले हिस्सों में बारिश देखने को मिला है।
दिल्ली, जो पिछले सात सालों से गर्म जाड़ों से होकर गुजर रहा है, में भी देर से ही सही पर बारिश हुई है। जिसका सीधा असर लंबे समय बने रहने वाले प्रदूषण में कमी आने में दिखेगा। इस पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के कुछ जिलों में बारिश हुई है जिससे निश्चित ही किसानों को फायदा मिलेगा और लगातार बढ़ रहे तापमान पर कुछ समय के लिए रोक लगेगी।
पहाड़ों में आमतौर पर दिसम्बर से लेकर मार्च के शुरूआती दिनों तक कम से कम चार बार बर्फबारी देखी जाती रही है। खासकर, ऊपरी क्षेत्रों में बर्फबारी के कई दौर देखे जाते थे। निचले हिस्सों में, जिसमें पर्यटन स्थल भी आते हैं दिसम्बर के अंत और जनवरी के शुरूआती दिनों में बर्फबारी का पहला मौका आ जाता था। लेकिन, इस बर्फबारी होने की संख्या में कमी आ रही है, इसकी मात्रा में भी कमी दिखने लगी है। इस संदर्भ में हृदयेश जोशी की टिप्पणी को देख लेना अच्छा रहेगा:
‘‘दोस्तो, पहाड़ों से अच्छी खबर है। इस बार देर से ही सही लेकिन कई जगह बर्फबारी हुई है। इस बर्फबारी के कारण जो आइस लंबे से वहां जीम हुई है उसे टिके रहने में मदद मिलेगी। हर साल होने वाले हिमपात इस आइस के लिए एक कवर का काम करता है जैसे हमारी त्वचा हड्डियों को घेरे रखती है और सुरक्षा कवच देती है। लेकिन हमने पिछले कुछ सालों में फरवरी और मार्च में रिकार्ड तापमान दर्ज किये हैं यानी इस बर्फ के टिके रहने की संभावना तभी है जब फरवरी और मार्च में तापमान कम हो।”
वैज्ञानिक कहते हैं कि पिछले पांच वर्षों (लगभग 2021-2026) में उत्तर-पश्चिम हिमालय की चोटियों पर औसत बर्फबारी 1980-2020 की दीर्घकालिक औसत से 25 प्रतिशत कम रही है। आईसीआईएमओडी के अनुसार 2024-25 की सर्दी में हिमक्षेत्रों की स्थिरता सामान्य से 23-24 प्रतिशत नीचे थी, जो 23 वर्षों का न्यूनतम स्तर है। अघिकांश सर्दियों में बर्फबारी 1980-2020 के औसत से काफी कम दर्ज की गई है।
विज्ञान धर्म की तरह उम्मीद से नहीं चलता, वह तय नियमों से चलता है जिनकी हम लगातार उपेक्षा करते रहे हैं। इसलिए हमें वह जरूरी कदम उठाने चाहिए जो हमारे पहाड़ों और ग्लेशियरों को सुरक्षित रखें। (इको एन इनर्जी टाॅल्क का 23 जनवरी, 2026 का पोस्ट)।’’
बर्फबारी पर्यटन के लिए चाहे जितना आकर्षक हो, यह पर्यावरण की पूरी संरचना में बेहद छोटा हिस्सा होता है। हालांकि इससे पर्यावरण का नुकसान उस तुलना में कई गुना अधिक है। धार्मिक पयर्टन बढ़ाने के नाम पर पहाड़ों में जिस तरह से चौड़ी सड़कें बनाई गई हैं, उससे सिर्फ पहाड़ ही कमजोर नहीं हुए हैं, इन पहाड़ों पर जाने वाली लाखों गाड़ियां इन पहाड़ों पर अपना कार्बन फुटप्रिंट भी छोड़ती जाती हैं। इसका सीधा असर पहाड़ पर हो रहा है। ये वो असर हैं जो धरती के गर्म होने के अतिरिक्त हैं।
पिछले कुछ सालों से पहाड़ इस तरह के सीधे अतिक्रमण को झेल रहे हैं। विकास के नाम पर होने वाली गतिविधियां आर्थिक तौर पर वहां के किसानों और जनजीवन को सीधे प्रभावित कर रही हैं। ये सारे प्रभाव गुणात्मक तौर पर बदल जाने पर अपनी जद में सीधे मैदानी क्षेत्रों को लेना शुरू करेंगे। खासकर, नदियों में पानी के बहाव में कमी दिल्ली जैसे राज्यों के लिए जीवन मरण का प्रश्न बना सकती हैं। यही स्थिति पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसानों के सामने भी उपस्थित हो सकती है।
पिछले कुछ सालों में पश्चिमी विक्षोभ की गतिविधियों में काफी बदलाव दिख रहा है। बीती गर्मी में मुंबई प्रदूषण के बढ़ने के पीछे एक बड़ा कारण इससे आने वाली हवाओं का रूख था। अरब सागर उठने वाले तुफान का असर अरब देशों से लेकर भारत तक में पड़ रहा है। हिमाचल में तेज गति से होने वाली बारिश भी इसी की गतिविधियों से जुड़ी हुई है। निश्चित ही पर्यावरण एक अंतर्राष्ट्रीय मसला है लेकिन इसका असर अलग-अलग देशों पर अलग अलग पड़ता है। भारत में इसका असर दिखने लगा है।
इस कारण यह जरूरी है कि न सिर्फ अपने पर्यावरण को समझा जाए, इस संदर्भ में अपनी पहलकदमी भी बढ़ाई जाए।
(अंजनी कुमार वरिष्ठ पत्रकार और एक्टिविस्ट हैं।)